Saturday, October 24, 2015



मैं कुछ नहीं हूँ

अर्पण कुमार

 

मैं कुछ नहीं हूँ

और अपने इस कुछ नहीं को

जीना चाहता हूँ

मैं अपने

कुछ न होने जैसे इस होने पर

तरंगित होना चाहता हूँ

जीवन एक उत्सव है

प्राप्ति और अप्राप्ति के किसी चक्कर में पड़कर

घनचक्कर नहीं बनना चाहता हूँ

 

खाली और विशाल स्टेडियम में

क्रिकेट ग्राउंड के

गोल-गोल घूमते हुए

भरी दुपहरी में मैं यही सोच रहा हूँ

 

मेरी पत्नी कुछ काम से बाजार गई है

घर की चाबी उसी के पास है

और जबतक वह आ न जाए

तब तक मैं  बेघर हूँ  

और खुद को बेघर

अनुभव करना चाहता हूँ

उतनी देर शिद्दत से

घरविहीन होने की इस बेचैनी और

असुविधा को

जीना चाहता हूँ भरपूर

इन आवारा, एकांत पलों में

 

मैं कुछ नहीं हूँ

और अपने इस कुछ नहीं को

अपने लिए एक वरदान मानता हूँ

स्टेडियम में बहती हवा और चारों तरफ फैले

धूप के साम्राज्य को

ही अपना धन मानता हूँ

 

मैं किसी देश का प्रधानमंत्री नहीं,

किसी राज्य का मुख्यमंत्री नहीं

किसी संस्था का प्रमुख नहीं

और भविष्य में ऐसा कुछ बनने की

मुझमें कोई संभावना नहीं

और फिलवक्त तो किसी घर का मालिक भी नहीं

मैं कोलतार की सड़क से

सप्रयत्न थोड़ा दूर हटकर

धूल और रेत की पगडंडी पर

तेज तेज चल रहा हूँ

बड़े-बड़े वृक्षों और उसके नीचे पसरी

घास की गंध को

अपने नथुनों में भरता हुआ

मैं अपने इस एकांत को

पेड़ों की अनथक हरीतिमा और

अपनी रिक्तता को

धूप की निःस्वार्थ उदारता से

भरना चाहता हूँ

इस वक्त मेरे लिए इनसे खूबसूरत उपहार

कुछ नहीं हैं

 

अगले पल का तो कोई पता नहीं

मगर इस समय मैं आजाद हूँ

बोर्डर पर सोने के वर्क किए हुए

चाँदी के अंतहीन वस्त्र को लपेटी यह धूप

मुझ पर अपनी नेह-वर्षा कर रही है

पसीने से तर-ब-तर मैं

भागा जा रहा हूँ

इस उम्मीद में कि असमय बढ़ आई मेरी तोंद

कुछ कम हो सके

और इसकी चिंता मुझे ही करनी होगी

हालाँकि मैं देश का प्रधानमंत्री नहीं हूँ

और जानता हूँ मेरे बेडौल होने से

देश बेडौल नहीं हो जाएगा

और  न ही कोई स्टार

जिसे फिल्मों में काम मिलना बंद हो जाए

बस अपने स्वास्थ्य की खातिर

और उससे भी अधिक यह कि

मुझे इस समय तेज चलना अच्छा लग रहा है

गाड़ियों की छलावे से भरी रफ्तार के बीच

मुझे मेरे पैरों को यूँ उदास और अकेला

नहीं छोड़ना है

वरना मेरे पैरों का हश्र भी

एक दिन इस देश के आदिवासियों का सा 

हो जाएगा

इस समय मैं गतिमान हूँ

खुद के साथ

और उन्मुक्त इस खुली आबोहवा में 

यह एकांत और खुली दोपहर ही

मेरा प्राप्य है

और मैं अपने इस हासिल पर प्रसन्न हूँ

 

मैं कुछ नहीं हूँ

और कुछ होना भी नहीं चाहता हूँ

बस इस दुपहरी में स्टेडियम के दो-तीन

चक्कर काट लेना चाहता हूँ

 

किसी अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच की

हलचल से फिलहाल मुक्त इस स्टेडियम का

मैं आभार मानता हूँ

जिसके विस्तृत और खुले परिसर में आकर

मैं कुछ देर के लिए

शहर के कसाव से मुक्त रह सका 

जो इस वक्त मेरे लिए सुलभ है

जब मेरे पास कहीं जाने के लिए

कोई घर नहीं है |

.................. 

पसरता अँधेरा

अर्पण कुमार 

 

बाहर से निरंतर

खदेड़े जा रहे अंधेरे ने

अपनी चादर फैलायी है

हमारे अंदर

ईर्ष्या, प्रतिशोध और सत्ता मद की

आग में जलते-बुझते लोगों ने

अपने आस-पास

एक दमघोंटू अँधेरा

कायम  कर रखा है

जहाँ एक-दूसरे को मात देने की कोशिश में

हर खिलाड़ी

अपनी-अपनी बिसात बिछाए

किसी औघड़ सा 

बुदबुदाता फिर रहा है अहर्निश

 

तिकड़म और भ्रष्टाचार से

हासिल की गई

बेशुमार संपत्ति की ढेर पर

धुत्त पड़ा

उबासी ले रहा है

तो कोई

उसकी चटुकारिता

इस हद तक कर रहा है कि

जरूरत पड़ने पर

उसके गुनाहों को भी

अपने सिर लिए जा रहा है

किसी और के किए अपराध की सजा

कोई और भोग रहा है

फिर चाहे इसके पीछे

उसका कभी कृतज्ञ हुआ होना हो या

फिर आतंकित होना 

जैसी करनी वैसी भरनी जैसी कहावतों ने

अपने अर्थ बदल लिए हैं

या बदलते वक्त में उसकी प्रासंगिकता  

खत्म हो चुकी है

अब पूँजीपति अपराध स्वयं करता है

और अगर कानून के हाथों

किसी को सजा देना

आवश्यक हो जाता है

तो उसके लिए एक गुनाहगार की

आउटसोर्सिंग कर ली जाती है

ठीक वैसे ही जैसे आजकल सरोगेट मदर

की संकल्पना जोर पकड़ रही है

जहाँ संतान की दरकार तो है

मगर वह किराए पर लिए गए

कोख से ही आ जाए

तो बेहतर है

क्यों अपना वक्त और फिगर

बर्बाद किया जाए

आखिर नौ महीनों की अवधि कोई कम

थोड़े ही होती है

जब पैसा देकर कोख किराए पर ली जा सकती है

तो क्यों न अपने पसंद के अंडाणु और शुक्राणू को

प्रोसेस करके उसे किराए की कोख में

जन्मने के लिए दे दी जाए

आखिर इन गरीब स्त्रियों को

कुछ पैसों की आमदनी ही हो जाएगी

यह पैसे  से आया अंधकार है

जहाँ मातृत्व भी दर्द-मुक्त होना चाहिए

जहाँ अँधेरा ही पुरशकुन शांति देता है

जहाँ अँधेरा ही रोशनी है

क्योंकि वहाँ  रोशनी को प्रोसेस करके

अपने पास आने दिया जाता है

 

एक ताकतवर आदमी की पाशविकता

कुछ ऐसी है कि

उसे सही-गलत अपने

कारनामों को अंजाम देने के लिए

अँधेरे का एक ओट चाहिए होता है

वह अपनी मनोदशाओं के बीच

कुछ ऐसा घिरा है कि

उजाला उसके लिए बेमानी हो गया है

और वह प्रकृति के चमकते आईने के आगे

खंडित और पहचाने जाने से बचना चाहता है  

आज के समय में

सफेदपोश ऐसे मनोरोगियों का

निरंतर बढ़ता आत्मविश्वास

और उजाले की क्रमशः घटती

उसकी जरूरत

डराती है हमें ।

.................

 

सुबह की सिहरन

अर्पण कुमार

 

गई रात देर तक जागती आँखें

खुद से अधिक मुझपर तरस खा रही थीं

खुलना चाह रही थीं पर

मेरा ख्याल कर बंद थीं और

अलसायी पड़ी थीं

सुबह हो चुकी थी

मगर मैं अपने कमरे में सोया था

 

खैर!  

सुबह की सुबह कब की हो चुकी थी

और उसकी रंगत की आहट

क्रमशः मेरे कमरे में भी

आनी शुरू हो रही थी

अलसायी आँखों ने दुनिया देखनी चाही

और मैं उन्हें मना न कर सका

मैं आँखें मलता हुआ दरवाजे की ओर बढ़ा

 

देखा

सूर्य अपनी सुनहली किरणों के साथ

मेरे स्वागत में खड़ा है

अपनी रक्तिम मुस्कान से मुझे अरुण

किए जा रहा है

एकदम से ,

मेरी तबीअत में उछाल आ गया

और यह क्या

एक सूर्य के अस्तित्व की कौन कहे,

मेरे शरीर का रोम-रोम

एक स्वतंत्र सूर्य बन गया

एक तरफ,

इनके ताप से जलता रहा

दूसरी तरफ ,

अपने ऐसे वजूद से

मैं स्वयं सिहरता रहा

सिहरता रहा|

..............

 

शिकारी

अर्पण कुमार

 

पहला

सूची बना देता है

उसकी जरूरतों की

दूसरा

बाजार  से खरीद लाता है

स्वयं कभी दहलीज

पार नहीं किया उसने

मगर अब वह

अपनी शिकारी प्रवृत्ति पर

और परदा नहीं डाल सकता

........................

 

नई चिड़िया

इस गिद्ध को समझ चुकी है |

......................

 

व्यक्ति बनाम तंत्र

अर्पण कुमार

 

वह बेहद कमजोर इंसान था

मगर कुछ परिस्थितियों के तहत

व्यवस्था उसके अनुकूल हो गई है

अब वह

सब पर शासन करना

चाहता है

मैं यह सब देख

और सोच रहा हूँ

 

उसे परास्त/चुप करने के लिए

पहले उसका तंत्र

दुर्बल करना होगा |

 

दिल्लगी

अर्पण कुमार

 

सावन यूँ ही

दिल्लगी कर रहा था

....................

लहलहाती फसल चौपट हो गई|

............ 

 

 

नींद की तैयारी

अर्पण कुमार

 

सैंकड़ों चेहरों से

अटी-पड़ी आँखों को

पानी से धोकर रिक्त किया है

साबुन से रगड़-रगड़ कर

चेहरे से दिनभर की खीझ और ऊब को

बड़ी और महान शख्सियतों के समक्ष  

सुबह से लेकर शाम तक

की जानेवाली अपनी मिमियाहट को और

उनके आगे अक्सरहाँ  शुरू हो जानेवाली

अपनी हकलाहट को

हटाया है

इस जीवन में कभी पूरा न हो

सकनेवाले अपने सपनों के

गर्द-गुबार को झाड़कर  

अपने शरीर को हल्का किया है

 

नए-पुराने सारे मुखौटों को

एक किनारे कर बिस्तर में

धँस गया हूँ

...............................

अब मुझे सो जाना चाहिए

एक उद्वेग-रहित नींद की

पूरी तैयारी

कर ली है मैंने।

.................

 

 

ट्यूटर

अर्पण कुमार

 

महानगर में पढ़नेवाला

सातवीं का बच्चा...

 

उसका ट्यूटर उसके गाल पर

हलकी चपत लगाता है

बच्चा शीघ्र ही अपनी कलम की नोंक

ट्यूटर की कलाई पर दे मारता है

 

शिक्षक-शिष्य का संबंध

उसके लिए

कोई मायने नहीं रखता

 

वह इतना ही सोच पाता है---

किसी ने उसे थप्पड़ मारा है

और वह उसका प्रत्युत्तर देगा

 

प्यार

अर्पण कुमार

 

प्यार

मन की अतल गहराईयों से

किया गया प्यार

जब अस्वीकृत होता है

.............

लगता है जैसे

एक बेहद कष्टदायक   

प्रसव-पीड़ा के बाद

कोई स्त्री

किसी मरे हुए बच्चे को

जन्म दी हो

...............

 

मेरे दोस्त-1

अर्पण कुमार

 

सपने मेरी आँखें

देखती थीं

पसीने की बूँदें

तेरी पेशानी पर होती थीं

……………

 

जब हमने साझा चुल्हा बनाया था

सींक एक ही रखी थी

अपनी तंदूरी रोटियाँ

हम उसी इकलौते सींक से निकालते थे

बारी-बारी

अपनी भूख और स्वाद के निमित्त

 

धर्म और भाषा की

देश और राजनीति की

आस्था और अनास्था की

अपने और पराए की

ऐसी बाढ़ आई कि

उसमें मिट्टी का हमारा वो साझा चुल्हा

एक झटके में बह निकला

अब वह सींक तुम अपने साथ

ले जा रहे हो अपने नए वतन को

बिछुड़कर अपने पुराने दोस्त और वतन से

मेरे दोस्त!

वह सींक तुम बेशक ले जाओ

मगर बताओ

पके सपनों की गंध

मिट्टी और आटे की

वह गरमागरम सोंधी खुशबू

आग की लौ में तमतमाए

दो चेहरों की वो संगत

दो जोड़ी हथेलियों की

वे तेज-तेज थापें

क्या हम फिर बाँट पाएँगे

 

मेरे दोस्त !

क्या मैं और तुम मिलकर

मिट्टी का वैसा ही

बड़ा साझा चुल्हा

फिर से नहीं बना सकते

जहाँ रोटियाँ सिंकने के साथ

आस-पड़ोस के दुःख-दर्द भी

सेंके जाते थे

 

मेरे दोस्त !

उस साझे चुल्हे के पास

हम दुबारा जमा नहीं हो सकते!

 

मेरे दोस्त -2

अर्पण कुमार

 

देहरी और सरहद से

सिर्फ तुम निकले थे

मेरे-तुम्हारे सपनों की सिलवटें तो 

हमारी साझी गली की

कच्ची मिट्टी में ही कहीं रह गई थीं

जहाँ दिन-दिन भर कबड्डी खेलते हुए

हमने अपनी-अपनी ताकत

खूब आजमाई

और चाहे हारता कोई हो

हँसते हम दोनों थे  

जहाँ गिल्ली-डंडा और कंचे खेलते

अपनी-अपनी निशानेबाजी पर इतराते

और एक-दूसरे को शाबाशी देते  

हम बड़े हुए थे

 

मेरे दोस्त!

मेरी जागती आँखों में सोते सपनों को

अब थपकी कौन देगा!

तुम्हारी उनींदी नींद

अब किसके आकस्मिक शोर से झल्लाकर

टूटेगी !

 

मेरे दोस्त!

क्या हमारी बेमतलब की

इन अठखेलियों का

अब कोई मतलब नहीं रह गया है

क्या हम सचमुच इतने बड़े हो गए हैं कि

अब हम एक देश में

एक साथ नहीं रह सकते

क्या हमारे विचारों का हुजूम

इतना बड़ा और अलहद हो गया है कि  

अब उनपर एक साथ एक आसमान के नीचे

चर्चा नहीं की जा सकती

क्या हमारे-तुम्हारे आसमान

अब अलग-अलग हो जाएंगे

धरती की तो हमने तकसीम कर ली

मगर क्या आसमान को भी

हम बाँट पाएँगे   

क्या भिन्न राय रखना

अनिवार्यतः दुश्मनी और अलगाव

के ही परिणाम में देखा जाना चाहिए

 

मेरे दोस्त !

क्या हम फिर से बचपन के

उन दिनों की ओर

नहीं लौट सकते

जब तेरा-मेरा कुछ जुदा-जुदा नहीं था

तब सपनों की साझेदारी में हम

लाहौर से दिल्ली तक

एक ही तबीअत रखते थे

 

मेरे दोस्त!

क्या जमीन पर खींची किसी लकीर में

इतनी ताकत है कि वह

अमन की हवा को

मुहब्बत की आँच को

और भाईचारे की बारिश को

किसी सरहद में कैद रख सके!

मेरे दोस्त!

हम अलग तो हो गए हैं 

मगर क्या हम देर तलक 

अलग-अलग रह पाएंगे !   

.................

    

टूटना हरदम बिखरना नहीं है

अर्पण कुमार

 

टूटना हरदम बिखरना नहीं है

बल्कि यह कहना

ज्यादा ठीक होगा कि

टूटना अक्सरहाँ बनना होता है।

...............

 

असुरक्षा

अर्पण कुमार

 

गाय दुलत्त्ती

मार देती है

दूध की बाल्टी

जमीन पर गिरती है ।

..........................

 

किसी की कुर्सी

देर तक हिलती है।

 

हिस्सा

अर्पण कुमार

 

नवंबर की गुनगुनी धूप को

छककर पीना

चाहता है

विराम दे सारे कार्यों को

आ जाता है वह

अपनी छत पर

.....................

 

उसके हिस्से के सूरज का

कत्ल हो जाता है।

……………..
 

इंटर की पढ़ाई पटना कॉलेज,पटना,पटना विश्वविद्यालय  से और बी.ए. एवं एम.ए. आदि की पढ़ाई दिल्ली विश्वविद्यालय से क्रमशः हंसराज कॉलेज एवं हिंदू कॉलेज से ; भारतीय जनसंचार संस्थान,नई दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा  एवं अंग्रेजी-हिंदी   अनुवाद में  स्नातकोत्तर डिप्लोमा दिल्ली  विश्वविद्यालय से हिंदी अकादमी, दिल्ली से पुरस्कृत कविताएँ,ग़ज़ल, लघु- कथाएँ, आलेख, समीक्षाएँ आदि महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओमें प्रकाशित|

 


मो.09413396755

1. नदी के पार नदी काव्य संग्रह नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली से प्रकाशित|

2. ‘ मैं सड़क हूँ काव्य-संग्रह, बोधि-प्रकाशन,जयपुर से प्रकाशित

शिक्षा  :  एम.ए. (हिंदी),दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली

एम.ए.(जनसंचार),गुरु जंबेश्वर विश्वविद्यालय,हिसार

स्नात्कोत्तर डिप्लोमा( हिंदी-अंग्रेज़ी अनुवाद), दिल्ली विश्वविद्यालय,दिल्ली              

स्नात्कोत्तर डिप्लोमा( हिंदी पत्रकारिता),भारतीय जनसंचार संस्थान,नई दिल्ली

प्रकाशन  :  कविताएँ,आलेख,कहानियाँ लघुकथाएँ,रिपोर्ताज,व्यक्ति-चित्र ,ग़ज़ल आदि विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं  में प्रकाशित। 

कविताएँ : जनसत्ता,हिंदुस्तान,नई दुनिया,कुबेर टाईम्स,अमर उजाला,पॉयनियर साप्ताहिक,बया,कथादेश,नई धारा,कादम्बिनी,गगनांचल,समकालीन भारतीय साहित्य,हरिगंधा,इंद्रप्रस्थ भारती,वीणा, राजस्थान पत्रिका, वागर्थ, वर्तमान साहित्य,भाषा, मधुमती समेत कई कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

कविताएँ : हिंदी समय, वर्धा में संकलित।

कहानियाँ और लघुकथाएँ :  भाषा, हरिगंधा आदि में प्रकाशित      

ग़ज़ल : वीणा,अक्षर पर्व,पाखी में प्रकाशित ।

पुस्तक समीक्षा : जनसत्ता,हिंदुस्तान,नई दुनिया,पॉयनियर साप्ताहिक,पुस्तक वार्ता,कथादेश,गगनांचल,इंडिया टुडे,समकालीन भारतीय साहित्य,आजकल, नया ज्ञानोदय, राजस्थान पत्रिका  आदि  पत्रिकाओं में प्रकाशित।      

साक्षात्कार: मनोहर श्याम जोशी,कमलेश्वर,इंदिरा गोस्वामी,रामदरश मिश्र,पद्मा सचदेव,वेद                   मारवाह,चित्रा मुद्गल ,नासिरा शर्मा, रघु राय समेत कई साहित्यिक एवं साहित्येतर  विद्वानों,विशेषज्ञों से लिए साक्षात्कार  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में  प्रकाशित ।

उल्लेखनीय भागीदारी : निराला साहित्य पर्व 2002,हिंदी अकादमी,दिल्ली के युवा काव्य-गोष्ठी  में काव्य-पाठ ।

चर्चा : 'नदी के पार नदी' काव्य-संग्रह की समकालीन भारतीय साहित्य ,इंद्रप्रस्थ भारती,आउटलुक,नवभारत टाईम्स आदि में समीक्षाएँ प्रकाशित। मैं सड़क हूँ की समीक्षा प्रगतिशील वसुधा,  वागर्थ, मधुमती, राजस्थान पत्रिका, कादम्बिनी आदि  में प्रकाशित।

प्रसारण: आकाशवाणी के दिल्ली एवं जयपुर केंद्र से कविताओं,कहानियों, भेंटवार्ता आदि का प्रसारण दूरदर्शन के जयपुर केंद्र पर साहित्यिक /सांस्कृतिक कार्यक्रम में भागीदारी। 

जन्मशती संस्मरण: उपेंद्रनाथ अश्क,नागार्जुन एवं फैज़ अहमद फैज़ पर आलेख नई दुनिया,वीणा,दीपशिखा 2010 (राजभाषा प्रकोष्ठ,इग्नू ,नई दिल्ली) में  प्रकाशित।  

 

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